Wednesday, 10 October 2018

Sadhguru On the subject of disability~ Quotes


On the subject of disability, Sadhguru reminds us that life comes in many forms, and society need not brand anyone as standard or substandard.
Life has come in so many forms, but societies have labels as to what is normal and what is not normal. But actually, if we look at any individual who has all four limbs intact, compared to the next person, are they not disabled in someaspect of life? 
Most people who are labeled as normal are breaking their brains every day. They call it stress, anxiety and so many things, but they are literally breaking the brain in some way.
So let us not brand ourselves or anyone else one way or the other, because life has come in so many ways. You have to respect that and do your best about it because it is a miracle, in the sense – today morning, the dosa or idli that you had was made with the soil that we walk upon, and that food became flesh and bone. In such a phenomenally complex process, which we have taken for granted unfortunately, certain things sometimes do not work the way we think they should. 

So never call yourself disabled. You are one way, I am another way. No person can claim he has a perfect body or a perfect mind. I am disabled in one way, you are disabled in another way. In some way, every one of us is disabled if we compare ourselves to someone else. 

Your bones break, that is painful and unfortunate. But most people who are labeled as normal are breaking their brains every day. They call it stress, anxiety and so many things, but they are literally breaking the brain in some way. 

No person can claim he has a perfect body or a perfect mind. In some way, every one of us is disabled if we compare ourselves to someone else.

The physical form is a mechanical process. Sometimes things will go wrong with it. It may come normally and later go wrong, or in the very womb, something can go wrong during manufacturing. This has nothing to do with that person. It has something to do with a variety of things because it is such a complex process that something can go off sometimes. 

But that should not determine how you live. How we live physically may be determined by many things. But nobody can decide how we live within ourselves except us. Nobody else can decide how I live within myself. In that sense, no one is disabled. 

(Pictures and quote content belong to Sadguru deva🙏🌻 )

Sunday, 19 August 2018

~Sadguru gurudeva ~ on Nandi deva

"Sadguru gurudeva on Nandi deva"

He is in waiting. The Nandi is a symbolism of eternal waiting, because waiting is considered the greatest virtue in this culture. One who knows how to simply sit and wait is naturally meditative. He is not expecting Shiva to come out tomorrow; he will wait forever. That quality is the essence of receptivity. The Nandi is Shiva’s closest accomplice because he is the essence of receptivity. Before you go into the temple, you must have the quality of the Nandi, to simply sit. You are not trying to go to heaven, you are not trying to get this or that – you go inside and simply sit. So, just by sitting here, he is telling you, “When you go into the temple, don’t do your fanciful things. Don’t ask for this or that. Just go and sit like me.”
The quality of the Nandi is that he just sits,alert.This is very important: he is alert. He is not sleepy, he is not sitting in a passive way; he is sitting, very active, no expectation, no anticipation, no looking forward to anything; full of alertness, full of life, but just sitting and that is meditation. Just waiting. Not for anything in particular. If you just wait without doing your own thing, then the existence will do its thing. Meditation essentially means the individual person is not doing his own thing; he is just there. So, once you are simply there, you become aware of the larger dimension of the existence, which is always in action. You become aware that you are a part of it.Even now, you are a part of it. But becoming aware that “I’m a part of it” is meditativeness. So, the Nandi is the symbolism of that. He just sits. Sitting here, he reminds everybody, “You must sit like me.”





(Picture courtsey Google)
Written Source As per Sadhguru's Isha teaching

Wednesday, 15 August 2018

हनुमान चालीसा में छिपे जिंदगी के सूत्र

कई लोगों की दिनचर्या हनुमान चालीसा पढ़ने से शुरू होती है। पर क्या आप जानते हैं कि श्री *हनुमान चालीसा* में 40 चौपाइयां हैं, ये उस क्रम में लिखी गई हैं जो एक आम आदमी की जिंदगी का क्रम होता है।

माना जाता है तुलसीदास ने चालीसा की रचना बचपन में की थी।

हनुमान को गुरु बनाकर उन्होंने राम को पाने की शुरुआत की।

अगर आप सिर्फ हनुमान चालीसा पढ़ रहे हैं तो यह आपको भीतरी शक्ति तो दे रही है लेकिन अगर आप इसके अर्थ में छिपे जिंदगी के सूत्र समझ लें तो आपको जीवन के हर क्षेत्र में सफलता दिला सकते हैं।

हनुमान चालीसा सनातन परंपरा में लिखी गई पहली चालीसा है शेष सभी चालीसाएं इसके बाद ही लिखी गई।

हनुमान चालीसा की शुरुआत से अंत तक सफलता के कई सूत्र हैं। आइए जानते हैं हनुमान चालीसा से आप अपने जीवन में क्या-क्या बदलाव ला सकते हैं….

*शुरुआत गुरु से…*

हनुमान चालीसा की शुरुआत *गुरु* से हुई है…

श्रीगुरु चरन सरोज रज,
निज मनु मुकुरु सुधारि।

*अर्थ* - अपने गुरु के चरणों की धूल से अपने मन के दर्पण को साफ करता हूं।

गुरु का महत्व चालीसा की पहले दोहे की पहली लाइन में लिखा गया है। जीवन में गुरु नहीं है तो आपको कोई आगे नहीं बढ़ा सकता। गुरु ही आपको सही रास्ता दिखा सकते हैं।

इसलिए तुलसीदास ने लिखा है कि गुरु के चरणों की धूल से मन के दर्पण को साफ करता हूं। आज के दौर में गुरु हमारा मेंटोर भी हो सकता है, बॉस भी। माता-पिता को पहला गुरु ही कहा गया है।

समझने वाली बात ये है कि गुरु यानी अपने से बड़ों का सम्मान करना जरूरी है। अगर तरक्की की राह पर आगे बढ़ना है तो विनम्रता के साथ बड़ों का सम्मान करें।

*ड्रेसअप का रखें ख्याल…*

चालीसा की चौपाई है

कंचन बरन बिराज सुबेसा,
कानन कुंडल कुंचित केसा।

*अर्थ* - आपके शरीर का रंग सोने की तरह चमकीला है, सुवेष यानी अच्छे वस्त्र पहने हैं, कानों में कुंडल हैं और बाल संवरे हुए हैं।

आज के दौर में आपकी तरक्की इस बात पर भी निर्भर करती है कि आप रहते और दिखते कैसे हैं। फर्स्ट इंप्रेशन अच्छा होना चाहिए।

अगर आप बहुत गुणवान भी हैं लेकिन अच्छे से नहीं रहते हैं तो ये बात आपके करियर को प्रभावित कर सकती है। इसलिए, रहन-सहन और ड्रेसअप हमेशा अच्छा रखें।

आगे पढ़ें - हनुमान चालीसा में छिपे मैनेजमेंट के सूत्र...

*सिर्फ डिग्री काम नहीं आती*

बिद्यावान गुनी अति चातुर,
राम काज करिबे को आतुर।

*अर्थ* - आप विद्यावान हैं, गुणों की खान हैं, चतुर भी हैं। राम के काम करने के लिए सदैव आतुर रहते हैं।

आज के दौर में एक अच्छी डिग्री होना बहुत जरूरी है। लेकिन चालीसा कहती है सिर्फ डिग्री होने से आप सफल नहीं होंगे। विद्या हासिल करने के साथ आपको अपने गुणों को भी बढ़ाना पड़ेगा, बुद्धि में चतुराई भी लानी होगी। हनुमान में तीनों गुण हैं, वे सूर्य के शिष्य हैं, गुणी भी हैं और चतुर भी।
*अच्छा लिसनर बनें*

प्रभु चरित सुनिबे को रसिया,
राम लखन सीता मन बसिया।

*अर्थ* -आप राम चरित यानी राम की कथा सुनने में रसिक है, राम, लक्ष्मण और सीता तीनों ही आपके मन में वास करते हैं।
जो आपकी प्रायोरिटी है, जो आपका काम है, उसे लेकर सिर्फ बोलने में नहीं, सुनने में भी आपको रस आना चाहिए।

अच्छा श्रोता होना बहुत जरूरी है। अगर आपके पास सुनने की कला नहीं है तो आप कभी अच्छे लीडर नहीं बन सकते।

*कहां, कैसे व्यवहार करना है ये ज्ञान जरूरी है*

सूक्ष्म रुप धरि सियहिं दिखावा, बिकट रुप धरि लंक जरावा।

*अर्थ* - आपने अशोक वाटिका में सीता को अपने छोटे रुप में दर्शन दिए। और लंका जलाते समय आपने बड़ा स्वरुप धारण किया।

कब, कहां, किस परिस्थिति में खुद का व्यवहार कैसा रखना है, ये कला हनुमानजी से सीखी जा सकती है।

सीता से जब अशोक वाटिका में मिले तो उनके सामने छोटे वानर के आकार में मिले, वहीं जब लंका जलाई तो पर्वताकार रुप धर लिया।

अक्सर लोग ये ही तय नहीं कर पाते हैं कि उन्हें कब किसके सामने कैसा दिखना है।

*अच्छे सलाहकार बनें*

तुम्हरो मंत्र बिभीसन माना, लंकेस्वर भए सब जग जाना।

*अर्थ* - विभीषण ने आपकी सलाह मानी, वे लंका के राजा बने ये सारी दुनिया जानती है।

हनुमान सीता की खोज में लंका गए तो वहां विभीषण से मिले। विभीषण को राम भक्त के रुप में देख कर उन्हें राम से मिलने की सलाह दे दी।

विभीषण ने भी उस सलाह को माना और रावण के मरने के बाद वे राम द्वारा लंका के राजा बनाए गए। किसको, कहां, क्या सलाह देनी चाहिए, इसकी समझ बहुत आवश्यक है। सही समय पर सही इंसान को दी गई सलाह सिर्फ उसका ही फायदा नहीं करती, आपको भी कहीं ना कहीं फायदा पहुंचाती है।

*आत्मविश्वास की कमी ना हो*

प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माही, जलधि लांघि गए अचरज नाहीं।

*अर्थ* - राम नाम की अंगुठी अपने मुख में रखकर आपने समुद्र को लांघ लिया, इसमें कोई अचरज नहीं है।

अगर आपमें खुद पर और अपने परमात्मा पर पूरा भरोसा है तो आप कोई भी मुश्किल से मुश्किल टॉस्क को आसानी से पूरा कर सकते हैं।

आज के युवाओं में एक कमी ये भी है कि उनका भरोसा बहुत टूट जाता है। आत्मविश्वास की कमी भी बहुत है। प्रतिस्पर्धा के दौर में आत्मविश्वास की कमी होना खतरनाक है। अपनेआप पर पूरा भरोसा रखे, और अपने लक्ष्य को पूरा करे।
🙏🙏
~A whatsapp share~
(Pictures courtesy google)

Monday, 6 August 2018

*GOD IS WATCHING YOU*

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One way to be vigilant in all that we think and say and do, is to be aware that God is omnipresent and omniscient, and is aware of all that we do.
I am reminded of a little boy who was visiting his grandmother.
There was a large picture of Sri Vishnu on the wall of her living room.
Underneath the picture was caption: God is Watching You!
The little boy became strangely quite and subdued on seeing the picture.
Noticing his mood, his grandmother asked him what the matter was.
"I suppose I must be good and behave myself here," replied the little boy.
~"If God is watching me, He is sure to punish me if I'm naughty."~
"Not at all!" Laughed grandmother.
*"God is watching you all the time because He loves you so much that He can't take His eyes off you!"*
(DADA J. P. VASWANI)
~From book ~ Karma ~

Friday, 3 August 2018

सुविचार


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जिस दिन हम ये समझ जायेंगे कि,सामने वाला गलत नहीं है सिर्फ उसकी सोच हमसे अलग है,उस दिन जीवन से दुःख समाप्त हो जायेंगे । "बड़प्पन" वह गुण है जो पद या उम्र से नहीं, "संस्कारों" से प्राप्त होता है।  

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भगवान ने सभी को धनुष के आकार के होंठ दिये है,मगर इनसे शब्दों के बाण ऐसे छोड़िये,जो सामने वाले के दिल को छू जाये,ना की दिल को छेद जाये..

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हम जिसे सफलता समझ बैठे है, वह सफलता है नहीं, बस दिखाई पड़ती , हर चीज़ जो दिखाई पड़ती है, सत्य से बहुत परे होती है। हम उसे सफल आदमी समझ लेते है, जो आर्थिक रूप से सम्पन्न है, या जो बहुत पढ़ा लिखा है, या जो ऊँचे पदों पर आसीन है, जिसके चारों ओर लोगों की भीड़ है। सफलता का ये पैमाना ग़लत है, ऐसे आदमी के पास स्वयं के जीने के लिए एक भी क्षण नहीं होता, वह कभी अपना जीवन नहीं जी पाता, उसकी सारी चेतना दूसरों को दिखाने गुज़र जाती है, वह वास्तविकता से बहुत दूर होता है, उसे स्वयं का अपनी नज़रों में कोई सम्मान नहीं होता, उसका पूरा जीवन प्रेम शून्य होता है। सफल वह है ,जिसके जीवन में प्रेम है, करूणा है, जो स्वयं का सम्मान करता है, जिसे दूसरों के सम्मान की तनिक भी आकांक्षा नहीं है। ऐसा व्यक्ति कहीं भी हो, चाहे ऊँचे पदों पर या नीचे पदों पर, चाहे आर्थिक रूप से अति सम्पन्न हो या न हो, चाहे वो उच्च शिक्षित हो या सामान्य , बस यही व्यक्ति सफल है।

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चावल अगर कुमकुम के साथ मिल जाऐं तो किसी के मस्तक तक पहुंच जाते हैं !और दाल के साथ मिल जाऐं तो खिचड़ी बन जाते है .!!अर्थात .....हम कौन हैं उसके महत्व से ज्यादा......किनकी संगत में हैं , यह बहुत महत्वपूर्ण है......!!!

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जानिए रामायण का एक सत्य...


केवल लक्ष्मण ही मेघनाद का वध कर सकते थे..क्या कारण था ?..पढिये पुरी कथा
                        ॐ
     हनुमानजी की रामभक्ति की गाथा संसार में भर में गाई जाती है। लक्ष्मणजी की भक्ति भी अद्भुत थी। लक्ष्मणजी की कथा के बिना श्री रामकथा पूर्ण नहीं है अगस्त्य मुनि अयोध्या आए और लंका युद्ध का प्रसंग छिड़ गया ।

    भगवान श्रीराम ने बताया कि उन्होंने कैसे रावण और कुंभकर्ण जैसे प्रचंड वीरों का वध किया और लक्ष्मण ने भी इंद्रजीत और अतिकाय जैसे शक्तिशाली असुरों को मारा॥

     अगस्त्य मुनि बोले- श्रीराम बेशक रावण और कुंभकर्ण प्रचंड वीर थे, लेकिन सबसे बड़ा वीर तो मेघनाध ही था ॥ उसने अंतरिक्ष में स्थित होकर इंद्र से युद्ध किया था और बांधकर लंका ले आया था॥
    ब्रह्मा ने इंद्रजीत से दान के रूप में इंद्र को मांगा तब इंद्र मुक्त हुए थे ॥ लक्ष्मण ने उसका वध किया इसलिए वे सबसे बड़े योद्धा हुए ॥

    श्रीराम को आश्चर्य हुआ लेकिन भाई की वीरता की प्रशंसा से वह खुश थे॥ फिर भी उनके मन में जिज्ञासा पैदा हुई कि आखिर अगस्त्य मुनि ऐसा क्यों कह रहे हैं कि इंद्रजीत का वध रावण से ज्यादा मुश्किल था ॥

     अगस्त्य मुनि ने कहा- प्रभु इंद्रजीत को वरदान था कि उसका वध वही कर सकता था जो.....

  (१) चौदह वर्षों तक न सोया हो,

   (२) जिसने चौदह साल तक किसी स्त्री का मुख न देखा हो और

   (३) चौदह साल तक भोजन न किया हो ॥

       श्रीराम बोले- परंतु मैं बनवास काल में चौदह वर्षों तक नियमित रूप से लक्ष्मण के हिस्से का फल-फूल देता रहा॥
    मैं सीता के साथ एक कुटी में रहता था, बगल की कुटी में लक्ष्मण थे, फिर सीता का मुख भी न देखा हो, और चौदह वर्षों तक सोए न हों, ऐसा कैसे संभव है ॥

     अगस्त्य मुनि सारी बात समझकर मुस्कुराए॥ प्रभु से कुछ छुपा है भला! दरअसल, सभी लोग सिर्फ श्रीराम का गुणगान करते थे लेकिन प्रभु चाहते थे कि लक्ष्मण के तप और वीरता की चर्चा भी अयोध्या के घर-घर में हो ॥

   अगस्त्य मुनि ने कहा – क्यों न लक्ष्मणजी से पूछा जाए ॥

    लक्ष्मणजी आए प्रभु ने कहा कि आपसे जो पूछा जाए उसे सच-सच कहिएगा॥

     प्रभु ने पूछा- हम तीनों चौदह वर्षों तक साथ रहे फिर तुमने सीता का मुख कैसे नहीं देखा ?, फल दिए गए फिर भी अनाहारी कैसे रहे ?, और १४ साल तक सोए नहीं ? यह कैसे हुआ ?

    लक्ष्मणजी ने बताया- भैया जब हम भाभी को तलाशते ऋष्यमूक पर्वत गए तो सुग्रीव ने हमें उनके आभूषण दिखाकर पहचानने को कहा ॥  
 
    आपको स्मरण होगा मैं तो सिवाए उनके पैरों के नुपूर के कोई आभूषण नहीं पहचान पाया था क्योंकि मैंने कभी भी उनके चरणों के ऊपर देखा ही नहीं.

    चौदह वर्ष नहीं सोने के बारे में सुनिए – आप औऱ माता एक कुटिया में सोते थे. मैं रातभर बाहर धनुष पर बाण चढ़ाए पहरेदारी में खड़ा रहता था. निद्रा ने मेरी आंखों पर कब्जा करने की कोशिश की तो मैंने निद्रा को अपने बाणों से बेध दिया था॥

      निद्रा ने हारकर स्वीकार किया कि वह चौदह साल तक मुझे स्पर्श नहीं करेगी लेकिन जब श्रीराम का अयोध्या में राज्याभिषेक हो रहा होगा और मैं उनके पीछे सेवक की तरह छत्र लिए खड़ा रहूंगा तब वह मुझे घेरेगी ॥

     आपको याद होगा राज्याभिषेक के समय मेरे हाथ से छत्र गिर गया था।

    अब मैं १४ साल तक अनाहारी कैसे रहा! मैं जो फल-फूल लाता था आप उसके तीन भाग करते थे. एक भाग देकर आप मुझसे कहते थे लक्ष्मण फल रख लो॥
     आपने कभी फल खाने को नहीं कहा- फिर बिना आपकी आज्ञा के मैं उसे खाता कैसे?

      मैंने उन्हें संभाल कर रख दिया॥ सभी फल उसी कुटिया में अभी भी रखे होंगे ॥ प्रभु के आदेश पर लक्ष्मणजी चित्रकूट की कुटिया में से वे सारे फलों की टोकरी लेकर आए और दरबार में रख दिया॥ फलों की गिनती हुई, सात दिन के हिस्से के फल नहीं थे॥

    प्रभु ने कहा- इसका अर्थ है कि तुमने सात दिन तो आहार लिया था?

     लक्ष्मणजी ने सात फल कम होने के बारे बताया- उन सात दिनों में फल आए ही नहीं :—

१--जिस दिन हमें पिताश्री के स्वर्गवासी होने की सूचना मिली, हम निराहारी रहे॥

२--जिस दिन रावण ने माता का हरण किया उस दिन फल लाने कौन जाता॥

३--जिस दिन समुद्र की साधना कर आप उससे राह मांग रहे थे, ।

४--जिस दिन आप इंद्रजीत के नागपाश में बंधकर दिनभर अचेत रहे,।

५--जिस दिन इंद्रजीत ने मायावी सीता को काटा था और हम शोक मेंरहे,।

६--जिस दिन रावण ने मुझे शक्ति मारी,

७--और जिस दिन आपने रावण-वध किया ॥

  इन दिनों में हमें भोजन की सुध कहां थी॥ विश्वामित्र मुनि से मैंने एक अतिरिक्त विद्या का ज्ञान लिया था- बिना आहार किए जीने की विद्या. उसके प्रयोग से मैं चौदह साल तक अपनी भूख को नियंत्रित कर सका जिससे इंद्रजीत मारा गया ॥

    भगवान श्रीराम ने लक्ष्मणजी की तपस्या के बारे में सुनकर उन्हें ह्रदय से लगा लिया ।

         जय सियाराम जय जय राम       
     जय  शेषावतार लक्ष्मण भैया की
     जय संकट मोचन वीर हनुमान की

जय श्री राम ⛳⛳वंदेमातरम् ⛳⛳
               ⚜🕉⛳🕉⚜


Sunday, 17 June 2018

Fathers day without you︵‿✿‿︵  

From now on Every Father’s Day is going to be a painful reminder of your absence in my life.Dad,I wish I could just turn back time and live out every single day of my childhood with you as if it were a grand Father’s Day.Dad, your memories have become my heartbeats,which means I am thinking of you all the time just to stay alive. I miss you.I never knew that being fatherless would make me feel so aimless, worthless, helpless, powerless and heartless. Just one last chance,and I wish I could get to hug you.Then I would hold you tight and never let go. How do you expect me to cope up with the grief your death, when you were the only person who understood me for what I was and not for what I could be?A free~spirited person like you can never be proclaimed dead. You may not be around in person but your spirit will live on forever in our hearts. I miss you dad.I miss you dad. Friends It doesn’t matter whether it has been weeks,months or years,the pain of losing a father(parent)will keep pinching you for a lifetime.You will be able to relate to this fact if you have lost a dad. Death is life’s bitterest truth and there is no point in being in denial.Its ok to cry your heart out and give your soul a release.This is the only way you can truly mourn, move on and accept reality that he has passed away. Think of the beautiful childhood memories,think of how much he loved you, think about his warm hugs, think of how he cared for you and most importantly,think of how even today,he is watching down on you like the angel that he has always been.....popsie moi soulmate...i miss you so so much.. .
And ever since you went away papa,i am broken to the core of moi soul,there is a pain in the heart,that can become unbearable.I noticed that the longing from which i am suffering so much,becomes more and more difficult to bear.Something in moi is full of sorrow,so deep that i cannot reach it, can't analyze it,the claws of pain are tearing moi heart apart.Something in moi is crying desperately,can't get an idea why all is bleak,and there seems no hope at all,anywhere. There are times i think death would be better,i can't offer a rational explanation for this mood.but i would give anything to just die,I don't even know what causes it.Its just confusion,despair,sheer despair,quite simply,thats all i know,an endless longing ,a terrible tremendous desire,but for what ? For that which is so evasive,so far away,a non ending torment.Lately when i begin to cry,i just cannot stop, such a helpless feeling of despair comes over moi,moi heart wounded by so much longing,i simply cant bear it.Moi nervous system is shaken,So much sorrow is in moi soul that there is no speech left to express it,have no desire to speak.I am sort of empty. Everything seems to be dead.No desires are left,only one,only this terrible,deadly longing,but there seems to be no hope.It is a sort of peace made of darkness,and the most amazing thing is that something in moi doesn't mind this sorrow.More and more of it as if i were interested to see how far it can go.Where is the very depth,the end, the bottom of it?For reasons which are beyond moi understanding,i want more and more of this sorrow.I don't sink from sorrow why? It seems as if the whole of moi desire would be to dissolve,to be submerged by it, all seems to be still inside moi as if something has died deep in moi. Do not want to ask any questions, do not want to speak,people around moi their converstions torment moi core of the soul,even the mind seems completely still. Vinny~Papa your Dipssy,cant comprehend life any more without you,moi dad,moi best friend,moi soulmate moi guru...moi mentor... Show moi the path....i am terribly lost....
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Tuesday, 12 June 2018

Words of Advice From Yogananda

Words of Advice From Yogananda




“Every night when you sit to meditate, pray to God unceasingly.
Cry as you once cried to your mother or father, ‘Where are You? You made me. You are in the flowers, in the moon, and in the stars. Must You remain secret? Come to me. You must. You must.’
With the intellect and the love of your heart, tear at the veils of silence. With the rod of devotion churn the ether, and it shall produce God.”
“Your soul’s message cannot reach God through your mental microphone if it is broken by the hammers of restlessness. You must repair that microphone by practicing deep silence both in the morning and before sleep, until all restless thoughts disappear. Then, affirm deeply, ‘My Father and I are One,’ until you feel the response of God as deep, increasing peace. This peace will not be felt except through practice of the right method of meditation. This increasing peace, or bliss, is the surest proof of God’s contact and response.”

🌻by~Nayaswami Diksha jee🌻

Tuesday, 1 May 2018

Some of Moi Favourites

Check out moi channel for moi favourite music
https://www.youtube.com/channel/UCh_jyCGoRRAyaN9SPsEYxNA
Boluverd of burning memories 
~Some of moi Favorite music ~
Whosoever is reading it...Moi dear dear Soul...May you flow forth in all your beauty, mystery, and shining light! May each day bring pride & honor to you in being born on this beautiful planet and its challenges brought to you to view the world, magically as often as you can. May you feel a great sense of belonging, acceptance and comfort in the lap of this beautiful~beautiful Universe. May each day,you in graceful way allow blessings, courage,gratitude, and peace to flow through you into the universe.May you get tuned into that deep energy that connects us to all things,and you open your eyes to different, more fully embodied ways of living.
With all moi love...
Deepika.dk~°~The Gypssysoul
(Fvrt Hindi cinema)
~
Khamoshi,Panchvati,Pyaasa,Kaagaz Ke Phool,Kamla,Chashme Buddoor, Abhimaan, Aar Paar, Masoom, Satyakam,Anupama,
Salaam Bombay,Chaudhvin Ka Chand,Daag,Avishkaar,Mausam,
Seema,Sujata, Anurag,Jeevan Mukt ,Saraswatichandr,Kitaab ,Hawas,Mirch Masala,36 Chowringhee Lane, parichay,
Uski Kahani,Teesri Kasam ,
Madhu Malti, Arohan, Party, Albert Pinto Ko Gussa Kyoon Aata Hai,Raincoat,Holi, Parzania,Maya Darpan,Griha Pravesh,Aastha: In the Prison of Spring,Meenaxi: A Tale of Three Cities,Hu Tu Tu, Antarnaad, Heaven on Earth,Chandni Bar,Astitva, Charandas Chor,Daman,Mitr~ My Friend, Hazaaron Khwaishein Aisi,Dance of the Wind, Chameli,Dharavi,Bhumika: The Role,Bandit Queen,Bazaar
Aakrosh,Bheja Fry,Suraj Ka Satvan Ghoda,The Blue Umbrella,Chakra,Dharm,Mandi
Page 3,Sardari Begum,Mohan Joshi Hazir Ho!,Trikal,Duniya Na Mane,Rudaali,Drishti,Dweepa
Fire,Monsoon Wedding,Woh Chokri,Hasina,Ek Din Pratidin,
Khandhar,New Delhi Times,
It’s Breaking News,Mahapurush
Katha,Manthan,Diksha,Maqbool
Dor,Genesis,Jane Do Bhi Yaaro,
Utsav,Ek Din Achanak,Water,
Firaaq,Nishant,Paar,Gaja Gamini,Ghatashraddha,Hari-Bhari,Earth,Joggers’ Park,
Ek Ruka Hua Faisla,Junoon
Kalyug,Ek Doctor Ki Maut
Sadma,Tamas,Ittefaq,Alaap,
Jagriti,Pather pancholi,
Silsila,Shakti,Trishul,tere naam,pushpak,Bawarchi,Main Tulsi Tere Aangan Ki,Saajan ki saheli,
Aradhana,do beega zameen,
Bandini,Madhumati,Ankur,Shree 420,Sholay,Haqeeqat, Aanand,
Dosti,Waqt,Deewar,Andhi,kati patang,Sangam,Bombai ka babu,Purab Aur Paschim,Mahal,
Jaane bhi do yaaron,Chupke Chupke,Aawara, Gol maal,
Padosan,Chhoti Si Baat, Rajnigandha,Parinda,Ardh satya, Bhumika,Kaagaz Ke Phool, Masoom,Mr India,
Ahneepath,Angoor,Mera Naam Joker,Don,Zanzeer,Satte Pe Satta,Qayamat Se Qayamat Tak,
Kabhie Kabhie,Do aankhe barah haath,Milli,Ijaazat,Amar prem,
Chalti Ka Naam, Koshish, Gaadi,Khubsurat,Basera,Ek Duuje Ke Liye,Arth,Naya daur,
Saaransh, Lamhein,Baton Baton Mein,Naram Garam,khatta meetha,Bootpolish,Sparsh,gumnaam,Aakrosh,Mandi,Anpadh,
Dr. Kotnis ki AmarKahani, Chameli ki shadi,Ek Ruka Hua Faisla,Chalti ka Naam gaadi, Kunwara Baap ,Roti,Upkaar,
Pyaasa,Mughal-e-Azam, Pakeezah,Mother India,Guide.
Kaaghaz Ke Phool,Awaara
Sahib Bibi Aur Ghulam,
(Favourite English cinema)
~
Bridges of madison county,
AWAKE: Life of Yogananda.(Award-winning documentary)
Gone With the Wind ,The Sound of Music,Doctor Zhivago,Bandit Queen,The Four Feathers,
The Godfather, Schindler's List , Roman Holiday,Casablanca,
The Wizard of Oz,One Flew Over the Cuckoo's Nest ,Vertigo,
Psycho,Sunset Boulevard,
The Bridge on the River Kwai,
It's a Wonderful Life,Apocalypse Now,Ben~hur, To Kill a Mockingbird,the best years of our lives,The Pianist,tootsie,
E.T. ,Jaws,Starwars,Ghostbusters,Inception,Gravity,The 40-Year-Old Virgin,Black Swan,
The Fifteen Streets ,The Black Velvet Gown ,The Cinder Path
The Dwelling Place,The Tide of Life ,The Gambling Man ,The Mallens,Our John Willie,The Black Candle ,The Man Who Cried ,The Glass Virgin,The Girl
The Moth ,The Rag Nymph
The Wingless Bird ,Colour Blind
The Round Tower ,Tilly Trotter ,The Secret ,A Dinner of Herbs,Pride and prejudice,Sense and Sensibility,
The Lizzie Bennet Diaries ,Lost in Austen,Becoming Jane, Mansfield park,Persuasion, Emma,Elizabeth,I Love You,
The Golden Age
(fvrt bengali cinema)
Pratigya,Apu Trilogy ,Pather Panchali, Nayak,Teen Kanya,
Subarnarekha,Aparajito,Jibon Thekey Neya ,A River Called Titas,Ghare-Baire ,Punascha,
Paroma,Antardhan,Amodini,
Asukh,Dekha,Paromitar Ek Din,
Chokher Bali,Shabdo,Chheley Kaar, Abohoman,Muktodhaara,
Aparajito,Postmaster,Parash Pathar,Jalsaghar,Apur Sansar, Devi,Monihara,Samapti
Kanchenjungha,KanchanjanghaAbhijan,The Expedition, Mahanagar,The Big City CharulataThe Lonely Wife
Kapurush-O-Mahapurush
  Kapurush,Mahapurush,Double Feluda,Two,Pikoo,Agantuk,The river,Joi Baba Felunath, Rabindranath Tagore , Seemabaddha ,The Inner Eye ,
Ashani Sanket ,Sadhu Judhishthirer Karcha,Basu Paribar,Chuattor, Agni Pariksha,Shilpi, Saptapadi, Pathe Holo Deri ,Harano Sur , Chaowa Paowa ,Jiban Trishna ,  Trijama, Indrani, Sabar Upare, Surjyo Toron, Ekti Raat, Grihadaha, Kamallata, Har Mana Har, Alo Amar Alo,
Jibon Mrityue,Aranyer Din Ratri
~ Favorite music ~ 


Moi Music List covers lots of Genres,At its core, the different blues traditions ,jazz and Country music have remained the absolute fvrt.Contemporary R&B,soft rock, New age.I £ove Classical Contemporary,Baroque, Renaissance ,Romantic Classical, Modern Classical music.....Though an amaetur there is a never-ending thirst to fully be absorbed in the beautiful classical works....So it remains moi first love...because it gives moi so much potential to learn...For moi its like Experiencing the deepest secrets of spirituality ....
But...i have to say...Moi musical taste is not limited to them,I keep exploring....but after all of it....i run back to moi classical loops... Because there is so much depth and subtlety in these forms that somehow other genres just don't do it for moi as much...Yup i know....
I'm a bit weird…up in moi mind..😁
So if you are kindaa weird like moi...come get lost in a rollercoaster musical list...
On moi YouTube channel...


In Hindustani~ music i love

Hindustani classical music,
Rabindra Sangeet,Traditional Classical Folk,Baul,Bhajan,Thumri,Dadra,Chaiti, Kajari,Sufi, Ghazals, Sufi~Qawwali,old bollywood songs, old new Filmi music, rock and roll fusions with Indian music,Raga rock, Religious Music of Pakistan like Hamd,Nasheeds,Naat AllCoke Studio series.












Monday, 30 April 2018

Thought of the day

When you have gone beyond thinking, and if you can still remain alert, aware, as if one is fast asleep but still alert—deep down at the very core of one’s being a lamp goes on burning, a small candle of light—then you will see your original face. And to see your original face is to be back in the Garden of Eden.
~Osho~

A stray fact: insects are not drawn to candle flames, they are drawn to the light on the far side of the flame, they go into the flame and sizzle to nothingness because they're so eager to get to the light on the other side.
~Michael Cunningham~

This too shall pass~a story


       ~This Too Shall Pass ~
【To Understand This Deeply】
~*~ ~*~ ~*~~*~ ~*~ ~*~~*~ ~*~ ~*~
Once A King Called Upon All Of His Wise Men And Asked Them, ” Is There A Mantra Or Suggestion Which Works In Every Situation, In Every Circumstances, In Every Place And In Every Time. In Every Joy, Every Sorrow, Every Defeat And Every Victory? One Answer For All Questions? Something Which Can Help Me When None Of You Is Available To Advise Me? Tell Me Is There Any Mantra?”All The Wise Men Were Puzzled By The King’s Question. They Thought And Thought. After A Lengthy Discussion, An Old Man Suggested Something Which Appealed To All Of Them. They Went To The King And Gave Him Something Written On Paper, With A Condition That The King Was Not To See It Out Of Curiosity. Only In Extreme Danger, When The King Finds Himself Alone And There Seems To Be No Way, Only Then He Can See It. The King Put The Papers Under His Diamond Ring.Some Time Later, The Neighbors Attacked The Kingdom. King And His Army Fought Bravely But Lost The Battle. The King Had To Flee On His Horse. The Enemies Were Following Him. Getting Closer And Closer. Suddenly The King Found Himself Standing At The End Of The Road - That Road Was Not Going Anywhere. Underneath There Was A Rocky Valley Thousand Feet Deep. If He Jumped Into It, He Would Be Finished…And He Could Not Return Because It Was A Small Road…The Sound Of Enemy’s Horses Was Approaching Fast. The King Became Restless. There Seemed To Be No Way.Then Suddenly He Saw The Diamond In His Ring Shining In The Sun, And He Remembered The Message Hidden In The Ring. He Opened The Diamond And Read The Message. The Message Was – “ THIS TOO SHALL PASS ”The King Read It . Again Read It. Suddenly Something Struck Him- Yes ! This Too Will Pass. Only A Few Days Ago, I Was Enjoying My Kingdom. I Was The Mightiest Of All The Kings. Yet Today, The Kingdom And All My Pleasures Have Gone. I Am Here Trying To Escape From Enemies. Like Those Days Of Luxuries Have Gone, This Day Of Danger Too Will Pass. A Calm Came On His Face. He Kept Standing There. The Place Where He Was Standing Was Full Of Natural Beauty. He Had Never Known That Such A Beautiful Place Was Also A Part Of His Kingdom.The Revelation Of The Message Had A Great Effect On Him. He Relaxed And Forgot About Those Following Him. After A Few Minutes He Realized That The Noise Of The Horses And The Enemy Coming Was Receding. They Moved Into Some Other Part Of The Mountains And Were Nowhere Near Him.The King Was Very Brave. He Reorganized His Army And Fought Again. He Defeated The Enemy And Regained His Empire. When He Returned To His Empire After Victory, He Was Received With Much Fanfare. The Whole Capital Was Rejoicing In The Victory.Everyone Was In A Festive Mood. Flowers Were Being Showered On King From Every House, From Every Corner. People Were Dancing And Singing. For A Moment King Said To Himself, “ I Am One Of The Bravest And Greatest King. It Is Not Easy To Defeat Me. With All The Reception And Celebration He Saw An Ego Emerging In Him.”Suddenly The Diamond Of His Ring Flashed In The Sunlight And Reminded Him Of The Message. He Open It And Read It Again: “ THIS TOO SHALL PASS ”.He Became Silent. His Face Went Through A Total Change - From The Egoist He Moved To A State Of Utter Humbleness. If This Too Is Going To Pass, It Is Not Yours. The Defeat Was Not Yours, The Victory Is Not Yours. You Are Just A Watcher. Everything Passes By. We Are Witnesses Of All This. We Are The Perceivers. Life Comes And Goes. Happiness Comes And Goes. Sorrow Comes And Goes.Now As You Have Read This Story, Just Sit Silently And Evaluate Your Own Life. This Too Will Pass. Think Of The Moments Of Joy And Victory In Your Life. Think Of The Moment Of Sorrow And Defeat. Are They Permanent ? They All Come And Pass Away. Life Just Passes Away. There Is Nothing Permanent In This World. Every Thing Changes Except The Law Of Change. Think Over It From Your Own Perspective. You Have Seen All The Changes. You Have Survived All Setbacks, All Defeats And All Sorrows. All Have Passed Away. The Problems In The Present, They Too Will Pass Away. Because Nothing Remains Forever. Joy And Sorrow Are The Two Faces Of The Same Coin. They Both Will Pass Away.You Are Just A Witness Of Change. Experience It, Understand It, And Enjoy The Present Moment - This Too Shall Pass
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“हनुमान जी की एक कथा'

श्री राम मे आस्था है तो
बंद द्वार में भी रास्ता हैं !!

जय जय श्रीराम
उत्तर रामायण के अनुसार अश्वमेघ यज्ञ पूर्ण होने के पश्चात भगवान श्रीराम ने बड़ी सभा का आयोजन कर सभी देवताओं, ऋषि-मुनियों, किन्नरों, यक्षों व राजाओं आदि को उसमें आमंत्रित किया।सभा में आए नारद मुनि के भड़काने पर एक राजन ने भरी सभा में ऋषि विश्वामित्र को छोड़कर सभी को प्रणाम किया।ऋषि विश्वामित्र गुस्से से भर उठे और उन्होंने भगवान श्रीराम से कहा कि अगर सूर्यास्त से पूर्व श्रीराम ने उस राजा को मृत्यु दंड नहीं दिया तो वो राम को श्राप दे देंगे।इस पर श्रीराम ने उस राजा को सूर्यास्त से पूर्व मारने का प्रण ले लिया। श्रीराम के प्रण की खबर पाते ही राजा भागा-भागा हनुमान जी की माता अंजनी की शरण में गया तथा बिना पूरी बात बताए उनसे प्राण रक्षा का वचन मांग लिया।तब माता अंजनी ने हनुमान जी को राजन की प्राण रक्षा का आदेश दिया। हनुमान जी ने श्रीराम की शपथ लेकर कहा कि कोई भी राजन का बाल भी बांका नहीं कर पाएगा परंतु जब राजन ने बताया कि भगवान श्रीराम ने ही उसका वध करने का प्रण किया है तो हनुमान जी धर्म संकट में पड़ गए कि राजन के प्राण कैसे बचाएं और माता का दिया वचन कैसे पूरा करें तथा भगवान श्रीराम को श्राप से कैसे बचाएं।धर्म संकट में फंसे हनुमानजी को एक योजना सूझी। हनुमानजी ने राजन से सरयू नदी के तट पर जाकर राम नाम जपने के लिए कहा। हनुमान जी खुद सूक्ष्म रूप में राजन के पीछे छिप गए। जब राजन को खोजते हुए श्रीराम सरयू तट पर पहुंचे तो उन्होंने देखा कि राजन राम-राम जप रहा है।प्रभु श्रीराम ने सोचा,"ये तो भक्त है, मैं भक्त के प्राण कैसे ले लूं"। श्री राम ने राज  भवन लौटकर ऋषि विश्वामित्र से अपनी दुविधा कही। विश्वामित्र अपनी बात पर अडिग रहे और जिस पर श्रीराम को फिर से राजन के प्राण लेने हेतु सरयू तट पर लौटना पड़ा। अब श्रीराम के समक्ष भी धर्मसंकट खड़ा हो गयाकि कैसे वो राम नाम जप रहे अपने ही भक्त का वध करें। राम सोच रहे थे कि हनुमानजी को उनके साथ होना चाहिए था परंतु हनुमानजी तो अपने ही आराध्य के विरुद्ध सूक्ष्म रूप से एक धर्मयुद्ध का संचालन कर रहे थे हनुमानजी को यह ज्ञात था कि राम नाम जपते हु‌ए राजन को कोई भी नहीं मार सकता, खुद मर्ययादा पुरुषोत्तम रामभी नहीं। श्रीराम ने सरयू तट से लौटकर राजन को मारने हेतु जब शक्ति बाण निकाला तब हनुमानजी के कहने पर राजन राम-राम जपने लगा ।रामजानते थे राम-नाम जपनने वाले पर शक्तिबाण असर नहीं करता।वो असहाय होकर राजभवन लौट गए।विश्वामित्र उन्हें लौटा देखकर श्राप देने कोउतारू हो गएऔर राम को फिर सरयू तट पर जानापड़ा।इस बार राजा हनुमान जी के इशारे पर जय जय सियाराम जय जय हनुमान गा रहा था। प्रभु श्री राम ने सोचा कि मेरे नाम के साथ-साथ ये राजन शक्ति और भक्ति की जय बोल रहा है। ऐसे में कोई अस्त्र-शस्त्र इसे मार नहीं सकता। इस संकट को देखकर श्रीराम मूर्छित हो गए। तब ऋषि व‌शिष्ठ ने ऋषि विश्वामित्र को सलाह दी कि राम को इस तरह संकट में न डालें। उन्होंने कहा कि श्रीराम चाह कर भी राम नाम जपने वाले को नहीं मार सकते क्योंकि जो बल राम के नाम में है और खुद राम में नहीं है। संकट बढ़ता देखकर ऋषि विश्वामित्र ने राम को संभाला और अपने वचन से मुक्त कर दिया। मामला संभलते देखकर राजा के पीछे छिपे हनुमान वापस अपने रूप में आ गए और श्रीराम के चरणों मे आ गिरे। तब प्रभु श्रीराम ने कहा कि हनुमानजी ने इस प्रसंग से सिद्ध कर दिया है कि भक्ति की शक्ति सैदेव आराध्य की ताकत बनती है तथा सच्चा भक्त सदैव भगवान से भी बड़ा रहता है।इस प्रकार हनुमानजी ने राम नाम के सहारे श्री राम को भी हरा दिया। धन्य है राम नाम और धन्य धन्य है प्रभु श्री राम के भक्त हनुमान।"जिस सागर को बिना सेतु के, लांघ सके न राम। कूद गए हनुमान जी उसी को, लेकर राम का नाम। तो अंत में निकला ये परिणाम कि राम से बड़ा राम का नाम"जय श्री राम जी
जय श्री हनुमान जी

(Picture courtesy google)

Friday, 27 April 2018

हनुमान बाहुक पाठ /Hanuman Bahuk


छप्पय
सिंधु तरन, सिय-सोच हरन, रबि बाल बरन तनु ।
भुज बिसाल, मूरति कराल कालहु को काल जनु ॥
गहन-दहन-निरदहन लंक निःसंक, बंक-भुव ।
जातुधान-बलवान मान-मद-दवन पवनसुव ॥
कह तुलसिदास सेवत सुलभ सेवक हित सन्तत निकट ।
गुन गनत, नमत, सुमिरत जपत समन सकल-संकट-विकट ॥१॥

स्वर्न-सैल-संकास कोटि-रवि तरुन तेज घन ।
उर विसाल भुज दण्ड चण्ड नख-वज्रतन ॥
पिंग नयन, भृकुटी कराल रसना दसनानन ।
कपिस केस करकस लंगूर, खल-दल-बल-भानन ॥
कह तुलसिदास बस जासु उर मारुतसुत मूरति विकट ।
संताप पाप तेहि पुरुष पहि सपनेहुँ नहिं आवत निकट ॥२॥

झूलना
पञ्चमुख-छःमुख भृगु मुख्य भट असुर सुर, सर्व सरि समर समरत्थ सूरो ।
बांकुरो बीर बिरुदैत बिरुदावली, बेद बंदी बदत पैजपूरो ॥
जासु गुनगाथ रघुनाथ कह जासुबल, बिपुल जल भरित जग जलधि झूरो ।
दुवन दल दमन को कौन तुलसीस है, पवन को पूत रजपूत रुरो ॥३॥

घनाक्षरी
भानुसों पढ़न हनुमान गए भानुमन, अनुमानि सिसु केलि कियो फेर फारसो ।
पाछिले पगनि गम गगन मगन मन, क्रम को न भ्रम कपि बालक बिहार सो ॥
कौतुक बिलोकि लोकपाल हरिहर विधि, लोचननि चकाचौंधी चित्तनि खबार सो।
बल कैंधो बीर रस धीरज कै, साहस कै, तुलसी सरीर धरे सबनि सार सो ॥४॥

भारत में पारथ के रथ केथू कपिराज, गाज्यो सुनि कुरुराज दल हल बल भो ।
कह्यो द्रोन भीषम समीर सुत महाबीर, बीर-रस-बारि-निधि जाको बल जल भो ॥
बानर सुभाय बाल केलि भूमि भानु लागि, फलँग फलाँग हूतें घाटि नभ तल भो ।
नाई-नाई-माथ जोरि-जोरि हाथ जोधा जो हैं, हनुमान देखे जगजीवन को फल भो ॥५॥

गो-पद पयोधि करि, होलिका ज्यों लाई लंक, निपट निःसंक पर पुर गल बल भो ।
द्रोन सो पहार लियो ख्याल ही उखारि कर, कंदुक ज्यों कपि खेल बेल कैसो फल भो ॥
संकट समाज असमंजस भो राम राज, काज जुग पूगनि को करतल पल भो ।
साहसी समत्थ तुलसी को नाई जा की बाँह, लोक पाल पालन को फिर थिर थल भो ॥६॥

कमठ की पीठि जाके गोडनि की गाड़ैं मानो, नाप के भाजन भरि जल निधि जल भो ।
जातुधान दावन परावन को दुर्ग भयो, महा मीन बास तिमि तोमनि को थल भो ॥
कुम्भकरन रावन पयोद नाद ईधन को, तुलसी प्रताप जाको प्रबल अनल भो ।
भीषम कहत मेरे अनुमान हनुमान, सारिखो त्रिकाल न त्रिलोक महाबल भो ॥७॥

दूत राम राय को सपूत पूत पौनको तू, अंजनी को नन्दन प्रताप भूरि भानु सो ।
सीय-सोच-समन, दुरित दोष दमन, सरन आये अवन लखन प्रिय प्राण सो ॥
दसमुख दुसह दरिद्र दरिबे को भयो, प्रकट तिलोक ओक तुलसी निधान सो ।
ज्ञान गुनवान बलवान सेवा सावधान, साहेब सुजान उर आनु हनुमान सो ॥८॥

दवन दुवन दल भुवन बिदित बल, बेद जस गावत बिबुध बंदी छोर को ।
पाप ताप तिमिर तुहिन निघटन पटु, सेवक सरोरुह सुखद भानु भोर को ॥
लोक परलोक तें बिसोक सपने न सोक, तुलसी के हिये है भरोसो एक ओर को ।
राम को दुलारो दास बामदेव को निवास। नाम कलि कामतरु केसरी किसोर को ॥९॥

महाबल सीम महा भीम महाबान इत, महाबीर बिदित बरायो रघुबीर को ।
कुलिस कठोर तनु जोर परै रोर रन, करुना कलित मन धारमिक धीर को ॥
दुर्जन को कालसो कराल पाल सज्जन को, सुमिरे हरन हार तुलसी की पीर को ।
सीय-सुख-दायक दुलारो रघुनायक को, सेवक सहायक है साहसी समीर को ॥१०॥

रचिबे को बिधि जैसे, पालिबे को हरि हर, मीच मारिबे को, ज्याईबे को सुधापान भो ।
धरिबे को धरनि, तरनि तम दलिबे को, सोखिबे कृसानु पोषिबे को हिम भानु भो ॥
खल दुःख दोषिबे को, जन परितोषिबे को, माँगिबो मलीनता को मोदक दुदान भो ।
आरत की आरति निवारिबे को तिहुँ पुर, तुलसी को साहेब हठीलो हनुमान भो ॥११॥

सेवक स्योकाई जानि जानकीस मानै कानि, सानुकूल सूलपानि नवै नाथ नाँक को ।
देवी देव दानव दयावने ह्वै जोरैं हाथ, बापुरे बराक कहा और राजा राँक को ॥
जागत सोवत बैठे बागत बिनोद मोद, ताके जो अनर्थ सो समर्थ एक आँक को ।
सब दिन रुरो परै पूरो जहाँ तहाँ ताहि, जाके है भरोसो हिये हनुमान हाँक को ॥१२॥

सानुग सगौरि सानुकूल सूलपानि ताहि, लोकपाल सकल लखन राम जानकी ।
लोक परलोक को बिसोक सो तिलोक ताहि, तुलसी तमाइ कहा काहू बीर आनकी ॥
केसरी किसोर बन्दीछोर के नेवाजे सब, कीरति बिमल कपि करुनानिधान की ।
बालक ज्यों पालि हैं कृपालु मुनि सिद्धता को, जाके हिये हुलसति हाँक हनुमान की ॥१३॥

करुनानिधान बलबुद्धि के निधान हौ, महिमा निधान गुनज्ञान के निधान हौ ।
बाम देव रुप भूप राम के सनेही, नाम, लेत देत अर्थ धर्म काम निरबान हौ ॥
आपने प्रभाव सीताराम के सुभाव सील, लोक बेद बिधि के बिदूष हनुमान हौ ।
मन की बचन की करम की तिहूँ प्रकार, तुलसी तिहारो तुम साहेब सुजान हौ ॥१४॥

मन को अगम तन सुगम किये कपीस, काज महाराज के समाज साज साजे हैं ।
देवबंदी छोर रनरोर केसरी किसोर, जुग जुग जग तेरे बिरद बिराजे हैं ।
बीर बरजोर घटि जोर तुलसी की ओर, सुनि सकुचाने साधु खल गन गाजे हैं ।
बिगरी सँवार अंजनी कुमार कीजे मोहिं, जैसे होत आये हनुमान के निवाजे हैं ॥१५॥

सवैया
जान सिरोमनि हो हनुमान सदा जन के मन बास तिहारो ।
ढ़ारो बिगारो मैं काको कहा केहि कारन खीझत हौं तो तिहारो ॥
साहेब सेवक नाते तो हातो कियो सो तहां तुलसी को न चारो ।
दोष सुनाये तैं आगेहुँ को होशियार ह्वैं हों मन तो हिय हारो ॥१६॥

तेरे थपै उथपै न महेस, थपै थिर को कपि जे उर घाले ।
तेरे निबाजे गरीब निबाज बिराजत बैरिन के उर साले ॥
संकट सोच सबै तुलसी लिये नाम फटै मकरी के से जाले ।
बूढ भये बलि मेरिहिं बार, कि हारि परे बहुतै नत पाले ॥१७॥

सिंधु तरे बड़े बीर दले खल, जारे हैं लंक से बंक मवासे ।
तैं रनि केहरि केहरि के बिदले अरि कुंजर छैल छवासे ॥
तोसो समत्थ सुसाहेब सेई सहै तुलसी दुख दोष दवा से ।
बानरबाज ! बढ़े खल खेचर, लीजत क्यों न लपेटि लवासे ॥१८॥

अच्छ विमर्दन कानन भानि दसानन आनन भा न निहारो ।
बारिदनाद अकंपन कुंभकरन से कुञ्जर केहरि वारो ॥
राम प्रताप हुतासन, कच्छ, विपच्छ, समीर समीर दुलारो ।
पाप ते साप ते ताप तिहूँ तें सदा तुलसी कह सो रखवारो ॥१९॥

घनाक्षरी
जानत जहान हनुमान को निवाज्यो जन, मन अनुमानि बलि बोल न बिसारिये ।
सेवा जोग तुलसी कबहुँ कहा चूक परी, साहेब सुभाव कपि साहिबी संभारिये ॥
अपराधी जानि कीजै सासति सहस भान्ति, मोदक मरै जो ताहि माहुर न मारिये ।
साहसी समीर के दुलारे रघुबीर जू के, बाँह पीर महाबीर बेगि ही निवारिये ॥२०॥

बालक बिलोकि, बलि बारें तें आपनो कियो, दीनबन्धु दया कीन्हीं निरुपाधि न्यारिये ।
रावरो भरोसो तुलसी के, रावरोई बल, आस रावरीयै दास रावरो विचारिये ॥
बड़ो बिकराल कलि काको न बिहाल कियो, माथे पगु बलि को निहारि सो निबारिये ।
केसरी किसोर रनरोर बरजोर बीर, बाँह पीर राहु मातु ज्यौं पछारि मारिये ॥२१॥

उथपे थपनथिर थपे उथपनहार, केसरी कुमार बल आपनो संबारिये ।
राम के गुलामनि को काम तरु रामदूत, मोसे दीन दूबरे को तकिया तिहारिये ॥
साहेब समर्थ तो सों तुलसी के माथे पर, सोऊ अपराध बिनु बीर, बाँधि मारिये ।
पोखरी बिसाल बाँहु, बलि, बारिचर पीर, मकरी ज्यों पकरि के बदन बिदारिये ॥२२॥

राम को सनेह, राम साहस लखन सिय, राम की भगति, सोच संकट निवारिये ।
मुद मरकट रोग बारिनिधि हेरि हारे, जीव जामवंत को भरोसो तेरो भारिये ॥
कूदिये कृपाल तुलसी सुप्रेम पब्बयतें, सुथल सुबेल भालू बैठि कै विचारिये ।
महाबीर बाँकुरे बराकी बाँह पीर क्यों न, लंकिनी ज्यों लात घात ही मरोरि मारिये ॥२३॥

लोक परलोकहुँ तिलोक न विलोकियत, तोसे समरथ चष चारिहूँ निहारिये ।
कर्म, काल, लोकपाल, अग जग जीवजाल, नाथ हाथ सब निज महिमा बिचारिये ॥
खास दास रावरो, निवास तेरो तासु उर, तुलसी सो, देव दुखी देखिअत भारिये ।
बात तरुमूल बाँहूसूल कपिकच्छु बेलि, उपजी सकेलि कपि केलि ही उखारिये ॥२४॥

करम कराल कंस भूमिपाल के भरोसे, बकी बक भगिनी काहू तें कहा डरैगी ।
बड़ी बिकराल बाल घातिनी न जात कहि, बाँहू बल बालक छबीले छोटे छरैगी ॥
आई है बनाई बेष आप ही बिचारि देख, पाप जाय सब को गुनी के पाले परैगी ।
पूतना पिसाचिनी ज्यौं कपि कान्ह तुलसी की, बाँह पीर महाबीर तेरे मारे मरैगी ॥२५॥

भाल की कि काल की कि रोष की त्रिदोष की है, बेदन बिषम पाप ताप छल छाँह की ।
करमन कूट की कि जन्त्र मन्त्र बूट की, पराहि जाहि पापिनी मलीन मन माँह की ॥
पैहहि सजाय, नत कहत बजाय तोहि, बाबरी न होहि बानि जानि कपि नाँह की ।
आन हनुमान की दुहाई बलवान की, सपथ महाबीर की जो रहै पीर बाँह की ॥२६॥

सिंहिका सँहारि बल सुरसा सुधारि छल, लंकिनी पछारि मारि बाटिका उजारी है ।
लंक परजारि मकरी बिदारि बार बार, जातुधान धारि धूरि धानी करि डारी है ॥
तोरि जमकातरि मंदोदरी कठोरि आनी, रावन की रानी मेघनाद महतारी है ।
भीर बाँह पीर की निपट राखी महाबीर, कौन के सकोच तुलसी के सोच भारी है ॥२७॥

तेरो बालि केलि बीर सुनि सहमत धीर, भूलत सरीर सुधि सक्र रवि राहु की ।
तेरी बाँह बसत बिसोक लोक पाल सब, तेरो नाम लेत रहैं आरति न काहु की ॥
साम दाम भेद विधि बेदहू लबेद सिधि, हाथ कपिनाथ ही के चोटी चोर साहु की ।
आलस अनख परिहास कै सिखावन है, एते दिन रही पीर तुलसी के बाहु की ॥२८॥

टूकनि को घर घर डोलत कँगाल बोलि, बाल ज्यों कृपाल नत पाल पालि पोसो है ।
कीन्ही है सँभार सार अँजनी कुमार बीर, आपनो बिसारि हैं न मेरेहू भरोसो है ॥
इतनो परेखो सब भान्ति समरथ आजु, कपिराज सांची कहौं को तिलोक तोसो है ।
सासति सहत दास कीजे पेखि परिहास, चीरी को मरन खेल बालकनि कोसो है ॥२९॥

आपने ही पाप तें त्रिपात तें कि साप तें, बढ़ी है बाँह बेदन कही न सहि जाति है ।
औषध अनेक जन्त्र मन्त्र टोटकादि किये, बादि भये देवता मनाये अधीकाति है ॥
करतार, भरतार, हरतार, कर्म काल, को है जगजाल जो न मानत इताति है ।
चेरो तेरो तुलसी तू मेरो कह्यो राम दूत, ढील तेरी बीर मोहि पीर तें पिराति है ॥३०॥

दूत राम राय को, सपूत पूत वाय को, समत्व हाथ पाय को सहाय असहाय को ।
बाँकी बिरदावली बिदित बेद गाइयत, रावन सो भट भयो मुठिका के धाय को ॥
एते बडे साहेब समर्थ को निवाजो आज, सीदत सुसेवक बचन मन काय को ।
थोरी बाँह पीर की बड़ी गलानि तुलसी को, कौन पाप कोप, लोप प्रकट प्रभाय को ॥३१॥

देवी देव दनुज मनुज मुनि सिद्ध नाग, छोटे बड़े जीव जेते चेतन अचेत हैं ।
पूतना पिसाची जातुधानी जातुधान बाग, राम दूत की रजाई माथे मानि लेत हैं ॥
घोर जन्त्र मन्त्र कूट कपट कुरोग जोग, हनुमान आन सुनि छाड़त निकेत हैं ।
क्रोध कीजे कर्म को प्रबोध कीजे तुलसी को, सोध कीजे तिनको जो दोष दुख देत हैं ॥३२॥

तेरे बल बानर जिताये रन रावन सों, तेरे घाले जातुधान भये घर घर के ।
तेरे बल राम राज किये सब सुर काज, सकल समाज साज साजे रघुबर के ॥
तेरो गुनगान सुनि गीरबान पुलकत, सजल बिलोचन बिरंचि हरिहर के ।
तुलसी के माथे पर हाथ फेरो कीस नाथ, देखिये न दास दुखी तोसो कनिगर के ॥३३॥

पालो तेरे टूक को परेहू चूक मूकिये न, कूर कौड़ी दूको हौं आपनी ओर हेरिये ।
भोरानाथ भोरे ही सरोष होत थोरे दोष, पोषि तोषि थापि आपनो न अव डेरिये ॥
अँबु तू हौं अँबु चूर, अँबु तू हौं डिंभ सो न, बूझिये बिलंब अवलंब मेरे तेरिये ।
बालक बिकल जानि पाहि प्रेम पहिचानि, तुलसी की बाँह पर लामी लूम फेरिये ॥३४॥

घेरि लियो रोगनि, कुजोगनि, कुलोगनि ज्यौं, बासर जलद घन घटा धुकि धाई है ।
बरसत बारि पीर जारिये जवासे जस, रोष बिनु दोष धूम मूल मलिनाई है ॥
करुनानिधान हनुमान महा बलवान, हेरि हँसि हाँकि फूंकि फौंजै ते उड़ाई है ।
खाये हुतो तुलसी कुरोग राढ़ राकसनि, केसरी किसोर राखे बीर बरिआई है ॥३५॥

सवैया
राम गुलाम तु ही हनुमान गोसाँई सुसाँई सदा अनुकूलो ।
पाल्यो हौं बाल ज्यों आखर दू पितु मातु सों मंगल मोद समूलो ॥
बाँह की बेदन बाँह पगार पुकारत आरत आनँद भूलो ।
श्री रघुबीर निवारिये पीर रहौं दरबार परो लटि लूलो ॥३६॥

घनाक्षरी
काल की करालता करम कठिनाई कीधौ, पाप के प्रभाव की सुभाय बाय बावरे ।
बेदन कुभाँति सो सही न जाति राति दिन, सोई बाँह गही जो गही समीर डाबरे ॥
लायो तरु तुलसी तिहारो सो निहारि बारि, सींचिये मलीन भो तयो है तिहुँ तावरे ।
भूतनि की आपनी पराये की कृपा निधान, जानियत सबही की रीति राम रावरे ॥३७॥

पाँय पीर पेट पीर बाँह पीर मुंह पीर, जर जर सकल पीर मई है ।
देव भूत पितर करम खल काल ग्रह, मोहि पर दवरि दमानक सी दई है ॥
हौं तो बिनु मोल के बिकानो बलि बारे हीतें, ओट राम नाम की ललाट लिखि लई है ।
कुँभज के किंकर बिकल बूढ़े गोखुरनि, हाय राम राय ऐसी हाल कहूँ भई है ॥३८॥

बाहुक सुबाहु नीच लीचर मरीच मिलि, मुँह पीर केतुजा कुरोग जातुधान है ।
राम नाम जप जाग कियो चहों सानुराग, काल कैसे दूत भूत कहा मेरे मान है ॥
सुमिरे सहाय राम लखन आखर दौऊ, जिनके समूह साके जागत जहान है ।
तुलसी सँभारि ताडका सँहारि भारि भट, बेधे बरगद से बनाई बानवान है ॥३९॥

बालपने सूधे मन राम सनमुख भयो, राम नाम लेत माँगि खात टूक टाक हौं ।
परयो लोक रीति में पुनीत प्रीति राम राय, मोह बस बैठो तोरि तरकि तराक हौं ॥
खोटे खोटे आचरन आचरत अपनायो, अंजनी कुमार सोध्यो रामपानि पाक हौं ।
तुलसी गुसाँई भयो भोंडे दिन भूल गयो, ताको फल पावत निदान परिपाक हौं ॥४०॥

असन बसन हीन बिषम बिषाद लीन, देखि दीन दूबरो करै न हाय हाय को ।
तुलसी अनाथ सो सनाथ रघुनाथ कियो, दियो फल सील सिंधु आपने सुभाय को ॥
नीच यहि बीच पति पाइ भरु हाईगो, बिहाइ प्रभु भजन बचन मन काय को ।
ता तें तनु पेषियत घोर बरतोर मिस, फूटि फूटि निकसत लोन राम राय को ॥४१॥

जीओ जग जानकी जीवन को कहाइ जन, मरिबे को बारानसी बारि सुर सरि को ।
तुलसी के दोहूँ हाथ मोदक हैं ऐसे ठाँऊ, जाके जिये मुये सोच करिहैं न लरि को ॥
मो को झूँटो साँचो लोग राम कौ कहत सब, मेरे मन मान है न हर को न हरि को ।
भारी पीर दुसह सरीर तें बिहाल होत, सोऊ रघुबीर बिनु सकै दूर करि को ॥४२॥

सीतापति साहेब सहाय हनुमान नित, हित उपदेश को महेस मानो गुरु कै ।
मानस बचन काय सरन तिहारे पाँय, तुम्हरे भरोसे सुर मैं न जाने सुर कै ॥
ब्याधि भूत जनित उपाधि काहु खल की, समाधि की जै तुलसी को जानि जन फुर कै ।
कपिनाथ रघुनाथ भोलानाथ भूतनाथ, रोग सिंधु क्यों न डारियत गाय खुर कै ॥४३॥

कहों हनुमान सों सुजान राम राय सों, कृपानिधान संकर सों सावधान सुनिये ।
हरष विषाद राग रोष गुन दोष मई, बिरची बिरञ्ची सब देखियत दुनिये ॥
माया जीव काल के करम के सुभाय के, करैया राम बेद कहें साँची मन गुनिये ।
तुम्ह तें कहा न होय हा हा सो बुझैये मोहिं, हौं हूँ रहों मौनही वयो सो जानि लुनिये ॥४४॥

Glory of Hanuman jee

हनुमानजी  सभी देवताओं में श्रेष्ठ हैं.सभी देवताओं के पास अपनी अपनी शक्तियां हैं. जैसे विष्णु के पास लक्ष्मी, महेश के पास पार्वती और ब्रह्मा के पास सरस्वती, हनुमानजी के पास खुद की शक्ति है. वे खुद की शक्ति से संचालित होते हैं.
वे इतने शक्तिशाली होने के बावजूद ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पित हैं,वे अपने भक्तों की सहायता तुरंत ही करते हैं और आज भी सशरीर हैं. इस ब्रह्मांड में ईश्वर के बाद यदि कोई एक शक्ति है तो वह है हनुमानजी. महावीर विक्रम बजरंगबली के समक्ष किसी भी प्रकार की मायावी शक्ति ठहर नहीं सकती.

~ God! God! God ! ~ from Songs of the Soul by Paramahansa Yogananda

Yes & No

"Say yes to life. And if one is aware, then one will be surprised that many times we unnecessarily say no... And we harm nobody except ourselves by saying that. No is fear-oriented; yes is love.

When you say yes, you are in a loving mood; whenever you are in a loving mood, you say yes - they both go together. When you say no, you reject life, and when you reject life, life rejects you. Then one becomes more and more sour, more and more bitter, and then there is a vicious circle. When you are bitter you say no more; when you say no more, life goes on rejecting you. In fact it is not life that rejects you; it is your rejection that is reflected by life. It is your no that resounds back to you.

Life is a mirror - it simply mirrors. If you say yes to it, it says yes. If you sing a song, it sings a song. If you are ready to dance with it, it dances with you. It all depends on you: life simply goes on echoing you - so never blame life. Life is absolutely innocent, as innocent as a mirror. Change your face; the mirror is never at fault. If you don't look beautiful in the mirror don't try to destroy the mirror - change your face.

That's what I mean: when you start saying yes you start changing your face - from fear to love, from rejection to acceptance. And that is the real transformation."
~Osho~

Inspirational Quotes by Sister Shivani jee


(Pictures courtsey google)